हिन्दी साहित्य का काल – विभाजन एवं नामकरण
- अभी तक जितने साहित्यिक इतिहास ग्रन्थ लिखे गये हैं उनमें विद्वानों ने काल – विभाजन की विभिन्न पद्धतियाँ अपनाई हैं ।
- डॉ. गणपति चन्द्र गुप्त ने अपने ग्रन्थ में चार पद्धतियों का उल्लेख किया है आदिकाल, भक्तिकाल, रीतिकाल एवं आधुनिककाल दूसरी पद्धति में इसके तीन भाग किए हैं । आदिकाल, मध्यकाल व आधुनिक काल तीसरी और अंतिम प्रणाली में शुद्ध काल-क्रम से विभाजन करने का सुझाव दिया है ।
- हिन्दी के सर्वप्रथम इतिहासकार ‘गार्सा-दा-तासी ́ ने अपने ग्रन्थ में काल – विभाजन नहीं किया । काल – विभाजन प्रस्तुत करने का सर्वप्रथम प्रयास जार्ज ग्रियर्सन ने किया था । सर्वप्रथम आचार्य रामचन्द्र शुक्लजी ने वैज्ञानिक काल-विभाजन प्रस्तुत किया । अन्य इतिहासकार ने उनका मात्र अनुकरण व अनुसरण किया हैं, ऐसा प्रतीत होता हैं । बाद में कुछेक विद्वानों ने अपनी अलग दृष्टि से भी काल विभाजन प्रस्तुत किया ।
जार्ज ग्रियर्सन का काल विभाजन
- काल विभाजन करने का सबसे पहला प्रयास व श्रेय जार्ज ग्रियर्सन को है, परन्तु उन्होंने स्वयं अपने ग्रन्थ की भूमिका में स्वीकार किया है कि उनके सामने अनेक ऐसी कठिनाइयाँ थीं जिनसे वे काल – क्रम एवं काल विभाजन के निर्वाह में पूर्णतः सफल नहीं हो सके । उन्होंने लिखा है, “सामग्री को यथा सम्भव कालक्रमानुसार प्रस्तुत करने का प्रयास किया गया है । यह सर्वत्र सरल नहीं रहा है और कतिपय स्थलों पर तो यह असंभव सिद्ध हुआ है।”
- इन्होंने हिन्दी साहित्य के इतिहास को निम्नलिखित ग्यारह शीर्षकों के अन्तर्गत विभाजित किया है—
- चारण काल (1702 – 1300 ई.)
- पन्द्रहवीं सदी का धार्मिक पुनर्जागरण
- जायसी की प्रेम कविता
- ब्रज का कृष्ण – सम्प्रदाय
- मुगल दरबार
- तुलसीदास
- रीति काव्य
- तुलसीदास के अन्य परवर्ती
- अट्ठारहवीं शताब्दी
- कम्पनी के शासन में हिन्दुस्तान और
- महारानी विक्टोरिया के शासन में हिन्दुस्तान ।
डॉ. ग्रियर्सन के विभाजन में अनेक विसंगतियाँ, न्यूनता एवं त्रुटियाँ होते हुए भी प्रथम प्रयास होने के कारण इसका अपना विशिष्ट महत्त्व है ।
मिश्र बन्धु का काल – विभाजन तथा नामकरण
मिश्र बन्धु ने आगे चलकर अपने ‘मिश्र बन्धु – विनोद’ (1913) में काल विभाजन के लिए नया प्रयास किया जिसे प्रत्येक दृष्टि से ग्रियर्सन के प्रयास से बहुत अधिक प्रौढ़ एवं विकसित कहा जा सकता है । इनका विभाजन इस प्रकार है-

आचार्य रामचन्द्र शुक्ल का काल विभाजन तथा नामकरण
मिश्र बन्धुओं के बाद आचार्य रामचन्द्र शुक्ल जी ने सन् 1929 में ‘हिन्दी साहित्य का इतिहास प्रस्तुत करते हुए काल-विभाजन के लिए नया प्रयास किया । इनके काल-विभाजन में अधिक सरलता, स्पष्टता एवं सुबोधता है । अपनी इसी विशेषता के कारण वह आज तक सर्वमान्य एवं सर्वत्र प्रचलित है । उनका काल – विभाजन इस प्रकार है-

डॉ. रामकुमार वर्मा का काल विभाजन तथा नामकरण
आचार्य शुक्ल जी के पश्चात् डॉ. रामकुमार वर्मा का नाम इस प्रसंग में उल्लेखनीय है, जिन्होंने अपना नया – काल विभाजन प्रस्तुत किया, जो इस प्रकार है-

डॉ. वर्मा के विभाजन के अंतिम तीन काल – विभाजन आचार्य शुक्ल जी के ही विभाजन के अनुरूप है, केवल ‘वीरगाथाकाल’ के स्थान पर ‘चारणकाल’ एवं ‘सन्धिकाल’ नाम देकर अपनी नवीनता स्थापित किया है ।
बाबू श्यामसुन्दर का काल विभाजन तथा नामकरण
इस परम्परा में बाबू श्यामसुन्दर दास द्वारा किया गया काल – विभाजन भी उल्लेखनीय है । उनके काल-विभाजन में आचार्य शुक्ल जी से कोई अधिक भिन्नता नहीं है । उनका काल- विभाजन इस प्रकार है-

डॉ. गणपतिचन्द्र गुप्त का काल विभाजन तथा नामकरण
उपर्युक्त काल-विभाजन की परम्परा में आचार्य शुक्ल जी के बाद कुछ विद्वानों ने थोड़ा-बहुत परिवर्तन करके अपना काल – विभाजन प्रस्तुत करने का प्रयास किया है, परन्तु शुक्ल जी का इतिहास लेखन का आधार ही अधिक वैज्ञानिक, तर्कसंगत एवं उपयुक्त प्रतीत होता है ।
डॉ. गणपतिचन्द्र गुप्त ने अपने ग्रन्थ ‘हिन्दी साहित्य का वैज्ञानिक इतिहास’ में उसका अनुमोदन किया है । उनका काल-विभाजन इस प्रकार है-

