प्रश्न : ब्राह्मी लिपि का वर्णन करें |
भारतीय उपमहाद्वीप की सबसे प्राचीन और महत्वपूर्ण लिपियों में ब्राह्मी लिपि का स्थान सर्वोपरि है। इसे भारतीय लिपियों की “माता” कहा जाता है, क्योंकि वर्तमान में प्रचलित लगभग सभी भारतीय लिपियाँ — जैसे देवनागरी, बंगला, गुजराती, तेलुगु, कन्नड़, तमिल, उड़िया, मलयालम आदि — इसी से विकसित हुई हैं।
उत्पत्ति : ब्राह्मी लिपि की उत्पत्ति के विषय में विद्वानों में मतभेद पाया जाता है। कुछ विद्वान इसे विदेशी लिपियों जैसे फिनीशियन या अरामी लिपि से प्रभावित मानते हैं, जबकि अधिकांश भारतीय विद्वानों का मत है कि यह भारत की स्वदेशी लिपि है। पं. ईश्वरचंद्र विद्यासागर, राजराजवर्मा और डी.सी. सिरकार जैसे विद्वानों ने इसे भारतीय सभ्यता की अपनी देन बताया है।
काल निर्धारण : ब्राह्मी लिपि के प्रमाण सबसे पहले मौर्यकाल (तीसरी शताब्दी ईसा पूर्व) के अशोक के अभिलेखों में मिलते हैं। सम्राट अशोक के शिलालेखों में प्रयुक्त ब्राह्मी लिपि उस समय की लोकप्रिय लिपि थी। हालांकि कुछ विद्वान इसका आरंभ इससे भी पहले — संभवतः वैदिक युग के उत्तरार्ध या छठी शताब्दी ई.पू. — में मानते हैं।
संरचना एवं विशेषताएँ :
- ब्राह्मी लिपि ध्वन्यात्मक लिपि थी, अर्थात प्रत्येक चिन्ह किसी निश्चित ध्वनि को प्रकट करता था।
- इसमें व्यंजन और स्वरों दोनों के लिए अलग-अलग चिह्न थे। प्रत्येक व्यंजन में स्वभावतः ‘अ’ स्वर निहित रहता था।
- यह लिपि बाएँ से दाएँ लिखी जाती थी, जैसे आज की देवनागरी।
- ब्राह्मी लिपि के अक्षर सरल, स्पष्ट और गोलाकार थे, जो बाद में क्षेत्रीय प्रभावों के कारण अलग-अलग रूपों में विकसित हुए।
- प्रारंभ में इसमें विराम चिह्न या शब्दों के बीच रिक्त स्थान का प्रयोग नहीं होता था, बाद में इन्हें जोड़ा गया।
प्रयोग और विकास : ब्राह्मी लिपि का प्रयोग मुख्यतः प्राकृत, पाली, संस्कृत और अन्य स्थानीय भाषाओं के लेखन में हुआ। समय के साथ यह लिपि विभिन्न क्षेत्रों में जाकर अलग-अलग रूपों में परिवर्तित हो गई — जैसे उत्तर भारत में गुप्त लिपि, दक्षिण भारत में ग्रंथ लिपि, और इनसे आगे चलकर देवनागरी, बंगला, कन्नड़, तेलुगु आदि लिपियाँ बनीं।
महत्त्व : ब्राह्मी लिपि भारतीय इतिहास, संस्कृति और भाषाशास्त्र की दृष्टि से अत्यंत महत्वपूर्ण है। अशोक के शिलालेखों की खोज और ब्राह्मी लिपि के पठन का श्रेय जेम्स प्रिन्सेप (James Prinsep) को जाता है, जिन्होंने 1837 ई. में इसे पढ़ने में सफलता प्राप्त की। इसके बाद भारत के प्राचीन इतिहास का नया अध्याय खुला।
निष्कर्ष : ब्राह्मी लिपि केवल एक लेखन पद्धति नहीं, बल्कि भारतीय संस्कृति, धर्म और ज्ञान परंपरा की संवाहक थी। यह भारत की वैचारिक और भाषाई एकता का प्रतीक है, जिसने भारतीय उपमहाद्वीप को एक साझा सांस्कृतिक सूत्र में बाँधा।